भगवान कृष्ण ने गीता के तीसरे अध्याय के बारहमें शलोक में यह स्पष्ट बताया है कि संसार की सारी संपत्ति उन्हीं की बनाई हुई है और वही उसके एकमात्र स्वामी है उन्होंने इस संपत्ति को जीवात्माओं के प्रारब्ध और कर्म अनुसार इस संपत्ति का टेंपरेरी वितरण करते हुए अपनी ही संपत्ति को जीवात्माओं के घरों में रखा है । यह संपत्ति उनके पास थोड़ी देर ही रहती है और इसका उद्देश्य केवल इतना है कि स्थूल शरीर और भौतिक जीवन ठीक प्रकार से चलता रहे । और भगवान कृष्ण इसी शलोक में यह भी बताते हैं कि इस आय का एक अंश यानी कि “विष्णु अंश “भगवान को लगातार अर्पण करते रहना चाहिए । यह बात भजनों में तो आ गई है जहां यह कहते हैं कि ” तेरा तुझ को अर्पण , क्या लागे मेरा ” पर वास्तविक जीवन में इस विष्णु अंश का त्याग सात्विक दान के रूप में यही लोग नहीं करते हैं या बहुत नगण्य दान करते हैं । ऐसे कम भाग्यशाली लोगों को प्रेरित करवाकर उनसे , उन्हीं के कल्याण के लिए दान करवा लेना , एक बड़े परमार्थ का कार्य है । महायोगी संत केवल इसी जीव कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए , इस पारमार्थिक कार्य को लगातार करते हुए , गौशालाएं संचालित करते हैं । विष्णु अंश को घर में कभी नहीं रखना चाहिए और जो लोग ऐसा करते हैं उनको भगवान कृष्ण ने ” चोर “कह कर पुकारा है । स्कंद पुराण में इस अंश को अपनी आय का दशांश कह कर परिभाषित किया है । अगर विष्णु अंश को दान न किया जाए तो इस सारे धन की गति नाश की ही होती है । सबसे अच्छा सात्विक दान , गौ सेवा के लिए किया हुआ दान होता है पर ऐसा लोग कर नहीं पाते क्योंकि इसको किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाया नहीं जाता और कोई प्रेरणा करने वाले भी अधिक लोग नहीं होते । पर बाबा जी के शिष्यों को तो इस बात का अनुभव हो ही चुका है कि बाबा जी गौ सेवा को सर्वोपरि मानते हैं क्योंकि गौ सेवा के द्वारा जीवन के सारे लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है । बाबा जी ने तो विंध्याचल में गौ सेवा करके ईश्वर को पूर्ण रूपेण प्राप्त किया , प्रकृति के पांचो तत्वों पर नियंत्रण कर लिया और बगैर पोथी पढ़े पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त किया । विंध्याचल की गौशाला इतनी अधिक शक्तिशाली है कि यहां पर गौ सेवा करके जब ईश्वर तक को प्राप्त किया जा सकता है तो साधारण भौतिक जगत से संबंधित उद्देश्यों और लक्ष्यों की प्राप्ति तो बहुत ही सुगम और सहज होती है । इस बात को अनेकों बार बताने की आवश्यकता है जिससे कि गौ सेवा की चेतना मन में जागृत हो , गौ सेवा के लिए सात्विक दान का कर्म किया जाए और निस्वार्थ भाव से सेवा करते हुए जीवन के सारे लक्ष्यों को बड़े सहज तरीके से प्राप्त किया जाए । हमारे वेद पुराण इसी विषय को अनेकों अनेक बार बतलाते हैं कि निस्वार्थ रूप से करी हुई सात्विक गौ सेवा मानव कल्याण का सबसे बड़ा साधन है । यह केवल जीवात्माओं के कल्याण के लिए नहीं है यह देश के कल्याण के लिए भी परम आवश्यक है । अब देश की चिंता तो साधारण लोग नहीं कर सकते पर अपनी चिंता तो मनुष्य को स्वयं करनी चाहिए ।
बाबा जी का विंध्याचल आश्रम और इसमें स्थित गौशाला बहुत बड़ी तपोस्थली है जहां पर असंख्य सिद्ध योगी सूक्ष्म शरीर और आत्मा के साथ में ईश्वर से युक्त होने के पश्चात भी मानव कल्याण के लिए सतयुग से लेकर आज तक तपस्या करते हैं यह आध्यात्मिक ऊर्जा का सबसे बड़ा केंद्र है । जो भी जीवात्मा इस तपोस्थली से जुड़ी है उसको यहां की महिमा को अवश्य जानना चाहिए और अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के और शास्त्रों के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए । समय-समय पर दान अवश्य करना चाहिए , दान करने की प्रक्रिया कोई वन टाइम प्रक्रिया नहीं होती है । जिस प्रकार से भोजन और निद्रा प्रतिदिन की जाती है उसी प्रकार से भजन और दान अगर प्रतिदिन ना सही तो कम से कम महीने में एक बार अवश्य करना चाहिए । यह अंतर्मन और आत्मा के शुद्धिकरण के लिए परम आवश्यक है ।
भगवान कृष्ण अपने मानव अवतार के पूरे जीवन में नित्य १३००० से अधिक गायों का गौदान और गौसेवा के लिए सतत दान करते और करवाते थे । भगवान कृष्ण के अवतरीकरण की तिथि इस वर्ष ७ सितंबर को मनाई जानी है । बाबाजी के निर्णय के अनुसार इसी दिन विंध्याचल के आश्रम में ” ब्रह्मऋषिश्री देवरहा बाबा श्रीमद्भागवत मंदिर” की आंतरिक दीवालों पर श्रीमद्भागवत की मार्बल पर लिखित शिलाओं को लगाने के कार्य का शुभारंभ किया जाना है ।
गौसेवा , संतसेवा और मंदिरसेवा के लिए विष्णु अंश को ट्रस्ट के निम्नलिखित दोनों में से किसी भी अकाउंट्स में , प्रवाहित किया जा सकता है ।
Brahmvetta Shri Devaraha Hans Baba Trust
A/C no. 10539167271
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