

- ब्रह्मऋषि श्री देवराहा बाबा जी ने हंस बाबा जी को अनेकों बार बताया था कि उनकी विंध्याचल गौशाला और विंध्याचल आश्रम दुनिया में आध्यात्मिक योग का सबसे बड़ा आश्रम है और बनेगा ।
• जब देवराहा हंस बाबा जी बाल रूप में 1955 में ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा जी के दर्शन में प्रयाग मंच के समक्ष खड़े हुए तो काफी देर तक बाबाजी का स्वरूप लुप्त हो कर उनके स्थान पर हनुमान जी बहुत देर मंच पर बैठे दिखाई दिए । बालक हंस दास जी के लिए यह बहुत ही बड़ा आध्यात्मिक अनुभव था । यह अनुभव हनुमान जी ने और देवराहा बाबा जी ने केवल हंस बाबा जी को ही क्यों कराया ? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हंस दास जी बाल रूप से ही संसार से बिल्कुल नहीं जुड़े थे और केवल भगवान से जुड़ना चाहते थे और उस समय में भी अपने आप में ही एक योगी थे उनके पूर्व जन्मों के संस्कार उनके साथ थे , जिसके कारण केवल उन्हीं को यह अवसर प्राप्त हुआ और बाकी देवराहा बाबा जी के लाखों शिष्यों को ऐसा कोई दर्शन लाभ नहीं हुआ ।
• जब हंस दास जी ब्रह्मृषि श्री देवरहा बाबा के पास दोबारा दर्शन में गए , तो सरस्वती जी ( बाबाजी की गुरु मां ) के आदेशानुसार उन्होंने देवरहा बाबा जी से तीन वरदान मांगे , पहला यह कि उनको आत्मज्ञान बगैर पोथी पढ़े हुए हो जाए दूसरा यह कि भगवान से साक्षात्कार और एकीकरण हो जाए , तीसरा यह की प्रकृति के पांचों तत्वों के ऊपर उनका कल्याणकारी नियंत्रण हो जाए । सरस्वती माताजी ने हंस बाबा जी को पहले ही बताया था की तुम्हें क्या-क्या कार्य करने होंगे और तुम क्या क्या करोगे । सरस्वती माता ने बाबाजी को बताया था कि तुमको अखंड भारत का निर्माण कराने और सनातन धर्म को विश्वव्यापी करने का कार्य सौंपा जा रहा है । इसीलिए भी एक बाल महायोगी ने एक महान महायोगी से यह तीनों वरदान मांगे थे ।
• ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा जी और सरस्वती माता का संवाद पहले ही हो चुका था और उसी के अनुसार जब बाल रूप में हंस बाबा जी , ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा जी के पास गए तो उन्होंने इन तीनों वरदानों को स्वीकार करते हुए बाबा जी को आदेश दिया कि वह उनकी विंध्याचल गौशाला में जा कर गौ चराएँ । इसका अर्थ यह हुआ की गौसेवा के द्वारा आत्मज्ञान और भगवान को प्राप्त किया जा सकता है और भगवान को प्राप्त करने के बाद प्रकृति के पांचों तत्वों पर नियंत्रण हो ही जाना हैं । अब प्रश्न यह है अब चिंतन यह है की ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा जी ने बालक हंस दास जी को विंध्याचल ही क्यों भेजा ? यह सर्वविदित है कि ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा जी के अनेकों आश्रम और अनेकों गौशाला है थी , पर विधि के विधान के अनुसार उन्होंने विंध्याचल को ही चुना ।
• विंध्याचल आश्रम एक बहुत प्राचीन अत्यंत अधिक आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत तपो स्थली है । बाबा जी ने अनेकों बार बताया है की इस आश्रम और गौशाला में सतयुग , त्रेता युग , द्वापर युग और कलयुग के महान संत और महायोगी आज भी मानव कल्याण और जीव कल्याण के लिए , सूक्ष्म शरीर और आत्मा से तपस्या करते हैं । यह स्थान आत्मा और परमात्मा के योग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है , पूरे मृत्यु लोक में इससे बड़ा कोई स्थान ही नहीं है ऐसा विद्वान संतों को भी , चर्म चक्षुओं से या मानवीय बुद्धि से किसी को दिखाई नहीं देगा । इसको केवल महायोगी , जो अंतरंग योग की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं , वही इसको जान सकते हैं देख सकते हैं और बता सकतें हैं । देवरहा बाबाजी के हजारों विरक्त और गृहस्थ शिष्य रहे थे पर उन्होंने अपनी विंध्याचल तपोभूमि गौशाला और आश्रम के लिए केवल बालक हंस दास को ही क्यों चुना और उन्हें केवल विंध्याचल ही क्यों भेजा कहीं और किसी स्थान पर क्यों नहीं ? बहुत सारे लोग आज भी तर्क वितर्क करते रहते हैं और अपनी सांसारिक बुद्धि से महायोगियों का आकलन करते रहते हैं , इससे कोई लाभ नहीं होता। क्योंकि यह सब प्रक्रियाऐं आध्यात्मिक जगत में होती हैं और भौतिक संसार में होती ही नहीं है ।सांसारिक नश्वर शरीरों , चाहें वह कितने भी बड़े विद्वान क्यों न हों , कितने भी बड़े लौकिक सत्ताधारी क्यों न हों , का इसमें कोई भी योगदान नहीं होता । यह भगवान कृष्ण और राधिका जी का निर्णय होता है की किस महापुरुष के द्वारा क्या करवाया जाए । महापुरुष भौतिक संसार में नहीं पाए जाते और यह केवल आध्यात्मिक जगत के महायोगी ही हो सकते हैं ।
• यह महायोगी महापुरुष अदृश्य आध्यात्मिक जगत और दृश्य भौतिक जगत के बीच का सेतु होते हैं और पूरी सृष्टि के लिए परम कल्याणकारी होते हैं ।
• यहां इस तथ्य को जानना भी आवश्यक है कि संसार का पहला मनुष्य ( Biological human being ) विंध्याचल में ही हुआ था । ऐसा श्रीमद्भागवत के स्कंद छै में विस्तार से वर्णित भी है ।
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आत्मा और परमात्मा के अंतरंग योग की प्रचंड आध्यात्मिक ऊर्जा विंध्याचल आश्रम की तपोभूमि में और गौमाता में पूर्ण रूप से व्याप्त है। एक महायोगी की गौशाला , साधारण लोगों की गौशालाएं से बहुत भिन्न होती है। यहां पर की गई गौसेवा तुरंत परिणामदायी होती है । केवल वही व्यक्ति और संस्थाएं जो परम सौभाग्यशाली होते हैं वही यहां पर निस्वार्थ गौसेवा करके अपने मनुष्य जीवन काल में पुण्य कमाकर शक्ति , भक्ति और पूर्णानंद की अवस्था को प्राप्त कर सकते है। जहां पर गौसेवा करने से भगवान की प्राप्ति हो सकती है वहां पर साधारण जीवात्माओं के द्वारा गौसेवा करके सांसारिक उद्देश्यों की पूर्ति तो होना बहुत साधारण और निश्चित ही है । केवल सतत सेवा , निस्वार्थ सेवा , विश्वास और धैर्य धारण करके की गौमाता की साधना और सेवा की जाए तो सांसारिक उद्देश्यों की प्राप्ति देर सवेर निश्चित है ।
यह लेख स्वांत सुखाय है और पूरे देश और विश्व में महापुरुषों के जीवन उद्धरण के द्वारा गौ चेतना को जगाकर पूरे विश्व में गौ संवर्धन और संरक्षण करने के लिए है । यह सभी के लिए है।




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