Rich and respected peoples should do Cow Service





महाभारत में एक बड़ी प्रसिद्ध कथा है जिसमें यक्ष ने युधिष्ठिर से कई प्रश्न पूछे थे । इन सभी यक्ष प्रश्नों के उत्तर अगर सही नहीं होते तो पांचों पांडवों को शरीर छोड़कर मृत्यु को प्राप्त होना था। इन सभी प्रश्नों का युद्धिष्टर द्वारा सही उत्तर देने के कारण पांचों पांडवों के जीवन की रक्षा हुई । उनमें से एक प्रश्न यह था कि धनवान और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए सबसे अधिक आवश्यक कर्म कौन सा है । युद्धिष्टर ने उत्तर दिया की धनवान और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सबसे अधिक गौसेवा करना चाहिए । सारे पांडवों की युद्धिष्टर के सही और सटीक उत्तरों के कारण जान बच गई ।

इस पर आजकल के परिपेक्ष्य में विचार किया जाए तो अधिकतर धनी और प्रतिष्ठित व्यक्ति जनहित में बहुत से कार्य अवश्य करते हैं पर यह सब मानव समाज के कल्याण जैसे शिक्षा , स्वास्थ्य , आदि तक सीमित रहते हैं और यह लोग गौसेवा के लिए परम सात्विक दान करने में विश्वास नहीं करते या इस ओर बहुत कम ध्यान देते हैं । उनका दान अधिकतर राजसिक या तामसिक प्रवृत्ति का होता है क्योंकि इस तरह के दान के पीछे उन्हें यश और प्रसिद्धि की कामना रहती है । बहुत से लोग जो मंदिर या गौसेवा के लिए दान करते हैं बह अपने नाम का बोर्ड गौशाला या मंदिर आश्रमों के भवनों में लगाना चाहते हैं । यह सर्वविदित है की किसी भी नश्वर शरीर , चाहें बो देश का शासक / राजा , प्रधानमंत्री या अत्यंत धनी व्यक्ति हो , उसकी मृत्यु के साथ उसके नाम का पूर्ण विनाश हो जाता है । नाम केवल भगवान , देवता या श्रेष्ठ संतों का ही , अनंत काल तक रहता है । धनवान और प्रतिष्ठित व्यक्ति अपना धन और यश कमाने की प्रक्रिया में बहुत से गलत कार्य करके जाने अंजाने में बहुत पाप कमा लेते हैं । इन पापों के कारण उनकी आत्मा की सद्गति नहीं होती । निष्काम गौसेवा के द्वारा उनके पाप , पुण्यों में परिवर्तित हो जाते हैं और उनकी आत्मा की यात्रा सुख और सत्य और आनंद से भरी रहती है । ऐसी पुण्यात्मा के पूर्वजों , वर्तमान में परिवार के सदस्यों और उनकी भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को सुख और शांति का जीवन बिताने का सुअवसर मिलता है । गौसेवा और महानतम संतों के सिद्ध आश्रमों में मंदिर आदि के भवनों में अपना अंश लगाने से , जीवन के चारों पुरुषार्थों _ धर्म , काम , अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति सहज में ही हो जाती है । हमारे शास्त्रों में और कथाओं में गौसेवा के महात्म्य का वर्णन बहुत विस्तार से किया गया है और हमारे शास्त्र पूर्णतया सत्य हैं क्योंकि यह धनवान सेठों या राजनेताओं के द्वारा नहीं लिखे गए हैं पर भगवान की स्वयं की वाणी है जिसको महानतम ऋषियों और मुनियों ने श्रुति और आत्म साक्षात्कार के आधार पर रचित किया है । इनका तिरस्कार करके और अहंकार से युक्त होकर जो सनातनी व्यक्ति अपनी कृपणता के कारण यथोचित गौसेवा नही करते हैं वह न केवल अपने ही सबसे बड़े शत्रु होते हैं बल्कि मानव समाज के लिए भी बहुत हानिकारक होते हैं ।

श्रीमद्भागवत गीता के तीसरे अध्याय के बारहमें श्लोक में भगवान कृष्ण ने स्पष्ट घोषणा की है कि विश्व में सारी धन दौलत के वही एकमात्र स्वामी हैं और भगवान ही अपने धन को सब मानवों के घरों में रखते हैं जिससे सभी व्यक्ति अपना जीवनयापन ठीक से कर सकें पर इन सभी जीवात्माओं को अपना दशांश या अधिक , अपने ही कल्याण हेतु , गौसेवा आदि में प्रवाहित करना चाहिए । और जो कृपण व्यक्ति ऐसा नहीं करते वह भगवान कृष्ण की घोषणा के अनुसार चोर हैं ।

मनुष्यों और उनके धन की नश्वरता के बाबजूद , धनी और प्रतिष्ठित व्यक्ति गौसेवा के बहुत बड़े महात्म्य को बिलकुल भूल चुके हैं । लक्ष्मी जी की चंचलता को आज के परिपेक्ष्य में आजकल की घटनाओं के संदर्भ में देखते हुए सतर्क हो जाना चाहिए । पिछले एक सप्ताह में भारत के अदानी ग्रुप की दौलत आठ लाख करोड़ रुपए से अधिक गिर चुकी हैं । यह तो अधिकतर लोग जानते हैं की इसके पीछे भारत को आर्थिक रूप से कमजोर करने का अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र है , पर अदानी की साख और दौलत को बहुत नुकसान हुआ है

बाबाजी हमेशा कहते हैं की धनवान केवल और केवल वही है जिसके पास राम नाम का धन होता है । इस दृष्टि से बाबाजी ब्रह्मांड के सबसे धनवान व्यक्ति है जबकि उनके नाम से कोई खाता नहीं है न ही उनका कोई व्यक्तिगत धन है । पर मानव कल्याण और परोपकार के लिए बाबाजी एक दिव्य गौशाला का संचालन अपने आश्रम में करते हैं । इसके द्वारा सभी को गौसेवा करने का अवसर प्राप्त होता है और अपने कल्याण के लिए सच्चे धन यानी पुण्यों को अर्जित करने का अति दुर्लभ अवसर मिलता है । आजकल के कलियुग में आत्म कल्याण का सबसे सरल और सहज उपाय गौसेवा है पर अपनी कृपणता के कारण धनी और प्रतिष्ठित व्यक्ति इससे वंचित होकर अपनी बहुत अधिक हानि करते हैं

बाबाजी और आश्रम की प्रेरणा से हम लोग , धनी और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सात्विक दान के द्वारा गौसेवा के लिए , बोलते और लिखते रहते हैं । इसमें हमारा या आश्रम का कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है । विंध्याचल की गौशाला में गौसेवा करके जब बाबाजी को ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है , प्रकृति के पंचतत्वों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त हो सकता है और बगैर पोथी पढ़े आत्म ज्ञान प्राप्त हो सकता है , ऐसी गौशाला में हम लोग जैसे साधारण व्यक्तियों के लिए , गौसेवा करके लौकिक उद्देश्यों की प्राप्ति करना बहुत सहज और सरल है । श्रद्धा और विश्वास रखते हुए अपने ही कल्याण के लिए सभी धनवान , प्रतिष्ठित और बाकी सबको , अपनी सामर्थ्य के अनुसार विंध्याचल की गौशाला में यथोचित और समयानुसार गौसेवा करना परम आवश्यक है । इस दिशा में आश्रम से भेजे गए संदेशों की उपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए । अगर उपेक्षा करनी ही है तो संदेशवाहक की उपेक्षा चाहें तो करें , पर संदेश की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए

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