श्री देवराहा कृष्ण शरणम परावाणी गायन 43

 

पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित ” श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 3 फरवरी 2021 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 4739 से 4847 तक का है | ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी की परावाणी के लगभग प्रत्येक दोहे में योग शब्द का प्रयोग होता है । यह योग शरीरों का या ज्ञान चक्षु द्वारा दृश्य जड़ और चेतन पदार्थों और शक्तियों का नहीं होता , यह परम योग अनंत तत्वों का होता है – आत्मा और परमात्मा का । इस महायोग के फलस्वरूप महायोगी केवल सत्य ,सनातन सत्य का ही दर्शन करते हैं , उस पर ध्यान करते हैं और ध्यान में देखते हैं कि माया और माया से जनित जो भी व्यक्ति और वस्तुएं ,  और उनके सांसारिक सामाजिक संबंध इस संसार में दिखाई देते हैं वह अस्थाई हैं , और जो अस्थाई है वह सत्य नहीं हो सकता । सत्य केवल परमपिता परमेश्वर हैं , और उनका अंश आत्मा है । इसीलिए महायोगी संत कभी भी माया जनित वस्तुओं का संचय और संग्रह कभी नहीं करते , वह केवल आवश्यकता अनुसार धन को छूते हैं और दान के द्वारा प्राप्त धन/वस्तुओं को  आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तुरंत ही खर्च कर देते हैं । बाबाजी धन का संचय कभी नहीं करते और अपने शिष्यों को भी हमेशा उपदेश करते हैं कि धन का अधिक से अधिक प्रयोग गौ सेवा और भगवत सेवा में  करना चाहिए , क्योंकि जो साधारण मनुष्य है उनका योग भगवान के साथ में तो नहीं हो सकता पर वह सद्गुरु की शरण में आकर उनके उपदेश के अनुसार कार्य करके अपने पापों और बुराइयों को, अच्छाइयों और पुण्य में परिवर्तित करके सद्गति को प्राप्त हो सकते हैं । बाबा जी की कृपा से उनके अधिकांश शिष्यों को धन की प्राप्ति हुई है , और कोई भी अभाव का जीवन नहीं जीता है पर अब इन शिष्यों का जो अपने सदगुरु की कृपा से और ना केवल अपने भाग्य से ही धन की प्राप्ति करते हैं , उनको अपने धन का एक  बड़ा अंश , गौसेवा में भगवत सेवा में अवश्य लगाना चाहिए । यह उनके और उनके परिवार के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है , क्योंकि साधारण मनुष्य भगवान को तो प्राप्त नहीं कर सकते , पर सदगुरु के द्वारा बताए हुए मार्ग पर चलकर  उन की असीम कृपा के द्वारा , भगवान के लोक में जाकर भगवान को प्राप्त अवश्य कर सकते हैं। गुरु कृपा के अतिरिक्त हर जीवात्मा को अपने अस्थाई और सीमित शरीर से परमार्थ के अधिक से अधिक कार्य कम से कम समय में अवश्य करने चाहिए । मृत्यु लोक में रहकर आत्मा का परमात्मा से योग हो जाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

विडियो लिंक :-

https://www.facebook.com/100015734981573/videos/958733667994457/

https://youtu.be/qqYZfGucPwM

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