पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित ” श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 29 जनवरी 2021 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 4521 से 4629 तक का है | ब्रह्मवेता श्री देवराहा हंस बाबा जी हमेशा बताते हैं कि, आपके जन्म -जन्म का साथी आपके साथ हमेशा ही आपके हृदय में रहता है , और यह जो वाह्य जगत के साथी हैं , वह अस्थाई हैं , थोड़े समय के लिए हैं । स्थाई संबंध भगवान श्री कृष्ण के साथ में ही है जोकि हमारे हृदय में ही सदैव रहते हैं । भगवान श्री कृष्ण अंतरजगत के अदृश्य साथी हैं , और सारथी भी हैं , और सारा जीवन वही चलाते हैं , वही कर्ता है , हम कर्ता भी नहीं हैं । पर भगवान श्री कृष्ण अदृश्य हैं, दिखते नहीं । वास्तविकता में जो नहीं दिखता है , वही है और जो दिखता है वह है ही नहीं । एक महायोगी का भगवान श्री कृष्ण के साथ में योग , आत्मा और परमात्मा का योग है , शरीर का नहीं । शरीर के जाने के पश्चात भी योगी की परम योग की स्थिति बनी रहती है और उनकी आत्मा जो पूर्ण रूप से भगवान श्री कृष्ण के साथ में सर्व योग के द्वारा संयुक्त हो चुकी है , वह मानव कल्याण के लिए कार्य करती रहती है । साधारण आत्माएं जिनका योग भगवान श्री कृष्ण के साथ में नहीं होता उनका आवागमन का चक्र बना रहता है वह अपने कर्मानुसार कई शरीरों , कई योनियों और कई लोकों में अनंत काल तक विचरण करती रहती हैं । सदगुरुदेव की प्राप्ति हरि की कृपा से ही होती है , भगवान सदगुरुदेव से इसीलिए मिलवाते हैं , जिससे जीवात्मा परमात्मा के सन्मुख होकर उनसे मिल जाए और उसके आवागमन का चक्र हमेशा के लिए छूट जाए । यह परम योग की स्थिति न केवल परम शक्तिशाली होती है बल्कि परम दयावान भी होती है । परम योग की स्थिति में योगी जब संसार को देखते हैं , तो उनके अंदर दया इसलिए उत्पन्न होती है कि पूरा संसार भटक रहा है , झूठ को सत्य समझ रहा है और सत्य को काल्पनिक मान रहा है । झूठ के दर्शन होने के साथ में , मनुष्यों में गलत काम करने की प्रवृत्ति स्वयं ही आ जाती है , और यह गलत कार्य उसको मुक्ति के लक्ष्य से दूर ले जाते रहते हैं । श्री देवराहा बाबा जैसे परम कृपालु महायोगी न केवल अपनी दया मनुष्यों पर करते हैं , वरन वह पूरे देश और विश्व के ऊपर अपनी दया करके मनुष्यों के देशों के ,और विश्व के संकटों को बहुत कम कर देते हैं या दूर कर देते हैं । दया का दान लेने वाला मनुष्य या देश यह जान ही नहीं पाता की उसने कोई लक्ष्य कैसे प्राप्त कर लिया , वह अपने आप को ही कर्ता मानकर प्रसन्न होता रहता है और अहंकार में डूबा रहता है कि मेरी वजह से ही यह काम हो पाया वरना तो होता ही नहीं । भगवान श्री कृष्ण की लीला के अनुसार , मनुष्य का और देशों का भाग्य मोटे तौर पर निश्चित रहता है , पर इसमें भी परिवर्तन की गुंजाइश रहती है , इसी में परम योगी की दया के द्वारा भाग्य का परिवर्तन भी अवश्य होता है | बहुत सारे शिष्य अपने सद्गुरु के साथ में कई वर्ष बिताने के बाद भी यह नहीं समझ पाते, कि इनमें और भगवान श्री कृष्ण में महायोग हो जाने के बाद , वास्तव में कोई अंतर नहीं है । सदगुरुदेव के दर्शन को ही भगवान का दर्शन मानकर , विश्वास करके , अपनी साधना करनी चाहिए उसी से सारे लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है ।
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