पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित “श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 22 जनवरी 2021 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 3977 से 4085 तक का है | ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी अपनी परावाणी में बता रहे हैं कि अपने सदगुरुदेव के चरण कमलों में शरणागति का भाव आने के बाद भक्त में भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों में प्रीति होती है इसके द्वारा बाबाजी के श्री चरण कमलों में ध्यान लगता है । ध्यान योग के द्वारा आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है ।आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद महायोगी अपनी अंतरंग दृष्टि से स्पष्ट देखते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं । जो कुछ वाह्य जगत में दिखता है वह भगवान के ही द्वारा निर्मित पर भगवान से बिल्कुल अलग माया जगत है , जिसका श्री कृष्ण के बगैर कोई अस्तित्व नहीं है । माया सत्य नहीं है और यह वाह्य जगत सत्य नहीं है , केवल भगवान श्री कृष्ण पूर्ण सत्य हैं और सर्वत्र हैं और उनके अतिरिक्त पूरे ब्रह्मांड में और कुछ है ही नहीं । आत्मज्ञान के द्वारा भगवान से अनन्य प्रेम हो जाता है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ही पूर्ण सत्य हैं बाकी सब झूठ या मिथ्या है । भगवान श्री कृष्ण में पूर्ण प्रेम योग होने के पश्चात महायोगी में भगवान श्री कृष्ण की अनंत अमोघ शक्तियां आ जाती हैं और हमेशा के लिए स्थित हो जाती हैं । महायोगी भगवान श्री कृष्ण की अनंत अमोघ शक्तियों का प्रयोग विश्व के कल्याण के लिए ही करते हैं और वह इन शक्तियों को बहुत कम लोगों को उनकी यथा भक्ति और ज्ञान के अनुसार उनको इस शक्ति का दान भी करते हैं । बाबा शक्ति को पूर्ण रूप से जिसको प्रदान करते हैं वह उन्हीं का अंतरंग स्वरूप बन जाता है और उनमें भी वही शक्तियां पूर्ण रूप से विद्यमान रहती हैं , इसका उदाहरण हमारे सदगुरुदेव ब्रह्मवेता श्री देवराहा हंस बाबा जी स्वयं है । इसके अतिरिक्त , क्षणिक शक्ति प्रभाव या शक्तिपात के द्वारा बाबा जी ने अनेकों भक्तों की समस्याओं को सुलझाया है । यह आध्यात्मिक शक्ति सांसारिक शक्तियों से बिल्कुल भिन्न है और इसको जानना साधारण लोगों के लिए असंभव है पर इसके प्रभाव के द्वारा उत्पन्न हुए परिणामों को उनके श्रद्धालु और शिष्य आसानी से समझ सकते हैं । अब यह भी कहना बड़ा मुश्किल है की आराधना की जो अवस्थाएं जैसे कि शरणागति , ध्यान , ज्ञान , प्रेम और शक्ति यह उसी क्रम में होती है जैसा कि यहां बताया गया है या इससे भिन्न क्रम में भी हो सकती हैं जैसे कि आत्मज्ञान का बाबा की कृपा से अचानक उत्पन्न होना उसके बाद भगवान कृष्ण की पूर्णता और सच्चाई को जानने के बाद उनसे पूर्ण प्रेम हो जाना और इसके द्वारा पूर्ण शरणागति को प्राप्त कर लेना । यहां पर आराधना की अवस्थाओं का क्रम बदल गया है । इसको समझना अत्यंत कठिन है कि भगवान के साथ में एकीकरण की कौन सी अवस्था पहले आती है और कौन सी बाद में , यह तो महायोगी ही जान सकते हैं और कोई अन्य व्यक्ति इसको जानने में असमर्थ है , जो भी क्रम हो , अंतिम परिणाम पूर्ण भगवत प्रेम की प्राप्ति और भगवत शक्ति की , परमार्थ हेतु प्राप्ति ही है । ब्रह्मर्षि श्री देवराहा बाबा जी जैसे महानतम महायोगी में ध्यान प्रेम ज्ञान और शक्ति का भी पूर्ण योग और समावेश है और भगवान के साथ में पूर्ण और स्थाई एकाकार के पूरे आयाम भी उसी परम योग का हिस्सा हैं ।
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