पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित “श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 2 जनवरी 2021 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 2130 से 2238 तक का है | ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी अपनी परावाणी में अपने सदगुरुदेव ब्रह्मऋषि श्री देवराहा बाबा जी के बारे में बता रहे हैं कि श्री देवराहा बाबा जी का पूर्ण सत्य के साथ में पूर्ण योग होने के कारण उनके श्रीमुख से केवल सत्य वचन और विचार ही प्रवाहित होते हैं और कुछ नहीं । “सत्य “और “कृष्ण ” एक ही है ,एक ही सच्चाई के दो नाम हैं । इसीलिए जो कुछ भी शब्द बाबा जी के श्री मुख से प्रवाहित होते हैं वह वर्तमान में सत्य होते हैं और अगर वह भविष्य के बारे में है तो वह भविष्यवाणियां कहलाते हैं और अंततोगत्वा जैसा वह बोलते हैं वैसा ही निश्चित रूप से होता ही होता है । बाबा जी की सत्य के साथ में अनन्य प्रीति है , परम पूर्ण प्रीति है क्योंकि सत्य और कुछ नहीं वरन भगवान श्री कृष्ण ही हैं । यह अवस्था बाबा जी ने भगवान कृष्ण के सामने पूर्ण शरणागति के द्वारा परम स्थाई रूप से प्राप्त की हुई है । श्री देवराहा बाबाजी शरीर से नहीं दिखते क्योंकि भौतिक शरीर का त्याग वह जून 1990 में कर चुके हैं पर वर्तमान में वह अपने सूक्ष्म शरीर और आत्मा से अपने परम प्रिय शिष्य और अपने आप में एक महानतम त्रिकालदर्शी महायोगी , ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी के अंतरंग हृदय में बैठकर अपने कार्यों का संचालन आज भी कर रहे हैं और यह सतत प्रक्रिया है जो हमेशा चलती रहेगी । त्रिकालदर्शी महायोगियों का आगमन संसार में केवल और केवल समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए होता है । इसी क्रम में बाबाजी का जो संकल्प अखंड भारत को निर्माण करने का है वह पूरा होगा । अखंड भारत के द्वारा ही विश्व में शांति और समृद्धि की स्थापना होना संभव है , सनातन धर्म के विश्वव्यापी होने से ही मानव जीवन का पृथ्वी पर बचना संभव है अन्यथा आसुरी तत्वों ने मनुष्य जाति को नष्ट करने के लिए बहुत सारे न्यूक्लियर , रासायनिक , जैविक और मिलिट्री अस्त्र और शस्त्र बनाकर बहुत अधिक मात्रा में अपने पास रखे हुए हैं । इन आसुरी शक्तियों को परास्त करके , नष्ट करके ही सनातन धर्म को विश्वव्यापी होना है और अखंड भारत का निर्माण होना है । आसुरी शक्तियों का विध्वंस करना किसी मानव के बस की बात नहीं है चाहे वह कितना ही बड़ा नेता या देश क्यों ना हो , यह कार्य केवल भगवान श्री कृष्ण के योग से युक्त त्रिकालदर्शी महायोगियों के द्वारा ही वर्तमान समय में होना है । जैसा कि बाबा जी बताते हैं कि कभी कभी भगवान श्री कृष्ण स्वयं अवतरित होकर अपनी लीला धरती पर करते हैं और कभी-कभी वह अपने दूतों को भेज कर अदृश्य जगत में रहकर इन महायोगियों के द्वारा वह अपने सारे कार्य करवाते हैं। श्री देवराहा बाबा जी अपने ध्यान योग में केवल “एक” का ही दर्शन करते हैं , केवल “सत्य “का ही दर्शन करते हैं या दूसरे शब्दों में केवल भगवान श्री कृष्ण का ही दर्शन करते हैं और अन्य किसी सांसारिक वस्तु या व्यक्ति का दर्शन उनके ध्यान में कभी नहीं आता । भगवान श्री कृष्ण के साथ में उनका पूर्ण अंतरंग योग होने के कारण वह अज्ञात जगत की सारी शक्तियों से संपन्न है जो उनको दिखती भी है और जिसको वह संचालित भी करते हैं और प्रवाहित भी करते हैं , भगवान के कार्यो को कराने हेतु । भगवान श्री कृष्ण के साथ में योग होने के बाद भी वह हमेशा भगवान श्री कृष्ण के अनंत प्रेम को और अधिक पाने के लिए तत्पर और लालायित रहते हैं क्योंकि यह अनंत और असीम है और यह प्रेम भौतिक जगत के प्रेम से बिल्कुल ही भिन्न है , इस प्रेम को पाने के बाद भौतिक जगत के प्रेम की कोई भी उपयोगिता और वैल्यू नहीं रहती।
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