पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित “श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 20 दिसम्बर 2020 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 1909 से 2017 तक का है |बाबाजी अपनी परा वाणी में बता रहे हैं कि भगवान श्री कृष्ण का निवास हृदय के अंदर होता है वह सर्वत्र होते हैं पर मूल रूप से प्रेम भाव से स्थित उनका स्थान हृदय में है । जब भगवान श्री कृष्ण के साथ में एक महायोगी का पूर्ण अंतरंग योग हो जाता है तो उससे उनको भगवान श्री कृष्ण की पूर्ण शक्ति का दर्शन होता है । यह शक्ति वह शक्ति है जिसके द्वारा पूरे अनंत कोटी ब्रह्मांडो का निर्माण किया गया है और उसके बाद उनका संचालन करना , यह सब भगवान श्री कृष्ण की शक्ति के द्वारा ही होता है और इसका पूर्ण दर्शन एक महायोगी को ही होता है । यही श्री कृष्ण शक्तियां श्री देवराहा बाबा जी में निवास करती हैं और उन्हीं के द्वारा उनके अंदर दया का नित्य निरंतर दर्शन होता रहता है । दया बनी रहती है चाहे आप उनके सामने उपस्थित हो या कहीं दूर बैठे हो उनका ध्यान करने से और उनके अंदर शरणागति करने से उनके द्वारा भगवान श्री कृष्ण की शक्ति का प्रयोग करके उनके द्वारा दया का प्रवाहित होना अवश्य होता है ।पूज्य बाबा श्री के चरण कमल में शरण लेने से शाश्वत आनंद की प्राप्ति होती है जो अस्थाई नहीं होता पर सदैव बना रहता है , मूलतः यह भाव कृष्ण भाव है और यह पूर्ण शरणागति से ही प्राप्त होता है ।पूज्य बाबा जी बताते हैं कि श्री देवराहा बाबा दया के पूर्ण सागर हैं , भाव के पूर्ण सागर हैं , ज्ञान के पूर्ण सागर हैं और दया , प्रेम भाव और ज्ञान को दान करने से उनकी सागर निधि कभी कम नहीं होती क्योंकि यह दया का सागर भगवान की दया के अनंत सागर से जुड़ा हुआ है । बाबाजी के यहां दया की कोई कृपणता नहीं होती केवल इतनी बात है कि शरणागति का भाव होना चाहिए और प्रेम का व्यवहार सबसे होना चाहिए और अच्छे कर्म होने चाहिए ।
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