पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित “श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 9 दिसम्बर 2020 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 1342 से 1450 तक का है | पूज्य बाबाजी बता रहे हैं कि भगवान श्री कृष्ण के प्रेम के ऊपर ध्यान करने से भगवान श्री कृष्ण के भाव का और उनकी प्रीति का दर्शन होता है यानी अनुभूति होती है । दर्शन होने से भगवान श्री कृष्ण के प्रेम भाव का भी दर्शन होता है और इसकी नित्यता का अनुभव होता है । कृष्ण प्रेम पर ध्यान अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों को पूर्ण करने के लिए नहीं किया जा सकता है , चाहे भगवान श्री कृष्ण आपके कार्यों में सहायक हो या ना हो , कृपा करें या ना करें उनको केवल प्रेम ही किया जाता है , वह कोई इच्छा पूर्ति का साधन नहीं है ।भगवन श्री कृष्णा का प्रेम ही अंतिम लक्ष्य है जिसका अर्थ भौतिक संसार की किसी भी वास्तु को प्राप्त करना नहीं है । जीवन में जो भी फल आपको मिलते हैं वह आपके कर्मानुसार होते हैं और उससे कृष्ण प्रेम का कोई संबंध नहीं रखना चाहिए । कृष्ण प्रेम अपने आप में ही एक बहुत बड़ा उद्देश्य है अब अगर उनकी अहैतुकी कृपा हो जाती है तो ठीक है , नहीं होती है तो भी ठीक है । यह अवस्था बहुत उच्च कोटि के संतो को ही प्राप्त हो पाती है और यह संत भगवान से कोई भी वस्तु या कृपा तक स्वीकार करने से मना कर देते हैं वह केवल प्रेम भाव भक्ति उनसे मांगते हैं और इसके अतिरिक्त वह उनसे कोई भी वस्तु या भाव लेने को तैयार ही नहीं होते । ऐसी स्थिति में ऐसे महान संतों के पीछे भगवान स्वयं भागते हैं , ऐसा भक्तमाल में और कई अन्य ग्रंथों में वर्णित है । पर भगवान कृष्ण के प्रेम पर ध्यान लगाने से शनै शनै सभी उद्देश्यों की पूर्ति अपने आप हो जाती है । भगवान कृष्ण के प्रेम पर ध्यान लगाने से कृष्ण की शक्ति का दर्शन होता है और अनुभव होता है कि भगवान कृष्ण ही पूर्ण आनंद है , और पूर्ण सत्य हैं और जो सत्य है उसके ऊपर तो ध्यान लगाना ही चाहिए । श्री देवराहा बाबा जी एक त्रिकालदर्शी महायोगी है और क्योंकि उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की सारी शक्तियों को कृष्ण प्रेम के द्वारा प्राप्त कर लिया है । इसलिए बाबा जी सब तरह के तापों का हरण करने में सक्षम है । साधारण मनुष्य उस स्थिति में पहुंचने में बिल्कुल सक्षम नहीं है , इसलिए सबको बाबा जी की शरण में जाना चाहिए । बाबा जी चाहे दिखे या ना दिखे , वह तो हैं ही और आपकी पुकार को अवश्य सुनेंगे , अगर उसमें शरणागति की भावना होगी और आपके कर्म अच्छे होंगे तब ।
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