पूज्य ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी द्वारा रचित “श्री देवराहा कृष्ण शरणम् ” का 7 दिसम्बर 2020 का गायन अदिति विष्णुप्रिया के, द्वारा ग्रन्थ के सूत्र संख्या 1233 से 1341 तक का है | ब्रह्मवेत्ता श्री देवराहा हंस बाबा जी अपनी परावाणी में बता रहे हैं कि श्री देवराहा बाबा जी का स्वरूप सबको सदैव प्रिय है , यह प्रेम नित्य निरंतर है क्योंकि उनका दर्शन या केवल ध्यान , आनंद देने वाला है । इसीलिए श्री देवराहा बाबा सर्वप्रिय और नित्य प्रिय हैं । क्योंकि बाबाजी सब के प्रति समान रूप से केवल कल्याण की भावना रखते हैं इसी कारण वह सर्वप्रिय है और नित्य प्रिय हैं । सांसारिक रिश्तो में प्रेम तो होता है पर नित्य निरंतर नहीं होता । एक शिष्य और सद्गुरु के बीच में सदैव नित्य निरंतर केवल प्रेम का ही भाव होता है । ऐसा बहुत बार देखा गया है कि पूज्य बाबा जी के दर्शन में घोर विरोधी व्यक्ति भी उनके मंच के सामने बाबा जी से अपनत्व का संबंध रखते हैं और थोड़े समय के लिए उनके मन से आपसी दुर्भावना समाप्त हो जाती है । यह केवल इसलिए है क्योंकि पूज्य बाबा जी पूर्णरूपेण प्रेम स्वरूप और आनंद स्वरूप हैं ।पूज्य बाबाजी इन दोहों में यह भी बता रहे हैं की शरणागति प्राप्त करने के लिए सदगुरु के चरणों के ऊपर अपना ध्यान केंद्रित करने से ही सफलता मिलती है बहुत से लोग जो सनातन धर्म में गुरु चरण की महिमा को नहीं जानते वह लोग अक्सर बोलते हैं कि बाबा पैर से आशीर्वाद क्यों देते हैं । पूज्य बाबाजी पैर से नहीं बल्कि अपने श्री चरणकमलों से अत्यधिक आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित करते हुए श्रद्धालुओं का कल्याण करते हैं और आशीर्वाद देते हैं । पूज्य बाबाजी अक्सर बताते हैं कि सद्गुरु के चरणो में सारे तीर्थ निवास करते हैं इसीलिए गुरु के शरीर में चरणों का बहुत बड़ा महत्व है । गंगा जी जो भगवान विष्णु जी के चरणों से उत्पन्न हुई है वह चरणामृत मनुष्यों को सब कुछ देने में सक्षम है । भौतिक जगत में समृद्धि और परा जगत में मोक्ष देने में गंगा जी पूर्व सक्षम है क्योंकि उनकी उत्पत्ति भगवान के श्रीचरणों से हुई है सदगुरु के श्रीचरणों में शरणागति और ध्यान लगाने से उद्देश्यों की पूर्ति शीघ्र होती है और व्यक्तित्व का आध्यात्मिक और भौतिक विकास होता रहता है यह अनवरत क्रिया है जो एक दिन या किसी सीमित समय सीमा में पूरी नहीं होती , इसमें पूरा का पूरा जीवन भी लग जाता है , पर जीवन आसानी से बीतता है और उद्देश्यों की पूर्ति होने से संतोष की प्राप्ति होती है और अंत में अपने कर्मों के आधार से और सद्गुरु की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है या हो सकती है ।
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