गौ सेवा महत्त्व

गौसेवा का अत्यधिक महत्व
चिड़ी चोंच भर ले गई , नदी न घटिया नीर ,
दान दिए धन ना घटे , कह गए दास कबीर
कबीरदास जी ने अपने दोहे में यह कहा है कि दान देने से आप की संपत्ति और धन कम नहीं होते बल्कि बढ़ते है । सनातन धर्म के शास्त्रों में भी यही वर्णित है । हमारे शास्त्रों के अनुसार कम से कम अपनी आय का दस प्रतिशत अंश विष्णु अंश होता है और यह भगवान मनुष्य को इसलिए देते है की वोह गौसेवा इत्यादि कार्य करके कुछ पुण्य कमाए , अपने पूर्व जन्मों के संचित पाप कर्मों को मिटाए और भविष्य में होने वाले जन्मों और वर्तमान जन्म को सफल बनाएं । पर माया से लोगों को इतना लगाव है कि इस बात को जानते हुए भी अधिकतर लोग भगवान विष्णु के अंश को भी अपने भोग में प्रयोग करते है या उसको संचित करे रहते हैं । यही धन ( विष्णु अंश) अगर घर में रखा जाए और गौसेवा के लिए प्रयोग ना किया जाए , घर घर में भारी अशांति और दुख का कारण बनता है । पारिवारिक मतभेद और लड़ाइं का यह सबसे बड़ा कारण है । पूरे समाज में अशांति का भी यह बहुत बड़ा कारण है । कुछ वर्ष पहिले उत्तर प्रदेश के एक बड़े शराब व्यावसाई और उनके उनके छोटे भाई ने एक दूसरे को दिल्ली में एक फार्म हाउस के स्वामित्व पर हुए मतभेद के कारण एक दूसरे को गोली मार दी और हजारों करोड़ों की संपत्ति दोनों छोड़ कर चले गए । अगर अपने धन से दान ना किया जाए तो यही धन अशांति और विनाश करा देता है । धन का एक सीमित मात्रा में त्याग , जीवन में शांति और सुख लाता है और धन से अत्यधिक लगाव अशांति और दुख लेकर ही आता है ।
आजकल जब मैं अपने संबंधियों , मित्रों और अनजान व्यक्तियों को गौसेवा करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास करता हूं तो बहुत लोग यह कहते हैं कि अभी कोरोना काल में इनकम तो बिल्कुल ही समाप्त हो चुकी है तो दान कैसे करे । इससे पहिले यह कहा जाता था कि नोटबंदी के कारण सारा मार्केट समाप्त हो चुका है और अब दान कहां से करें । यह सारी बातें अधिकांश झूठ होती है और यह इंसान के माइंड पर माया की जबर्दस्त पकड़ को ही दर्शाती हैं । एक साधारण आध्यात्मिक भिक्षु होने के कारण हम लोग माया की नागपाश को छुड़ाने का प्रयत्न करते हुए बताते है कि अगर वर्तमान आय कम है तो पूर्व में संचित संपत्ति में से दान और त्याग करके अपने जीवन को सफल बनाएं । कुछ लोग माया का आंशिक त्याग करते हुए आगे बढ कर दान करते हैं पर अधिकतर लोग माया ही के साथ रहने में अपना कल्याण समझते हैं । कोई दान करे या ना करें , इससे बाबाजी या उनकी गायों पर कोई अंतर नहीं पड़ता । गौमाता का आगमन पृथ्वी पर केवल मानवों के कल्याण के लिए हुआ है । जो उनको लाचार निरीह पशु मात्र मानते हैं वह विचार शून्य होते है । इन विषयों पर अपनी सांसारिक बुद्धि काम नहीं करती इसलिए जो भविष्य दृष्टा और दिव्य द्दृष्टा कहते हैं उनकी बात पर पूर्ण विश्वास करके अपनी क्षमता के अनुसार हृदय से गौसेवा करनी चाहिए । बाबाजी कहते हैं कि गौ और गोपाल में कोई भेद नहीं है और गौ माता की सेवा ही गोपाल की सेवा है । वास्तव में मनुष्यों को गौसेवा , गायों के प्रति बहुत कृतज्ञतपूर्वक करनी चाहिए और गौ को और गौपालक को नमन करते हुए करनी चाहिए क्योंकि यह सारी व्यवस्थाएं भगवान ने मनुष्य के कल्याण के लिए ही बनाई हैं । यह सब जानने के बाद भी अगर गौ माता को कष्ट उठाना पड़ता है तो इसके परिणाम मनुष्यों और उनके समाज के लिए कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकते । ब्रह्मऋषि श्री देवरहा बाबा ने कहा था कि जबतक भारत में गौहत्या बंद नहीं होता , समाज में शांति नहीं हो सकती है। गौहत्या विशेषकर सांडों और बैलों की हत्या इसलिए होती है क्योंकि इन्हें किसी आर्थिक यूटिलिटी का नहीं माना जाता । यह बिल्कुल निकृष्ट सोच है । भगवान के बनाए हुए संसार के संसाधनों पर गौवंश का पहिला अधिकार है और गौ का जीवन मानव जीवन से अधिक मूल्यवान है क्योंकि गौ पृथ्वी का ही चैतन्य अवतार है ।
गौ के तिरस्कार और हत्या के कारण आज मानव समाज विश्व युद्ध की कगार पर खड़ा है और भयंकर विनाश अवश्यंभावी है ।जो होना है वह तो होना ही है पर अपनी सुरक्षा के लिए गौमाता और त्रिकालदर्शी महायोगियों की शरण में जाना ही लोगों के लिए कल्याणकारी है ।
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